प्रदेश में बदहाल यातायात व्यवस्था, चौराहों पर जाम व जिम्मेदारी पर सवाल

लखनऊ। प्रदेश के कई शहरों में सड़क यातायात व्यवस्था लगातार सवालों के घेरे में है। प्रमुख चौराहों पर यातायात को सुचारु रखने के लिए डायवर्जन और यू-टर्न का सहारा लिया जा रहा है, लेकिन कई स्थानों पर चौराहे से कुछ ही दूरी पर वाहनों की लंबी कतारें लग रही हैं। ऐसे में यातायात प्रबंधन की प्रभावशीलता और संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
चौराहे खाली, कुछ दूरी पर लग रहा जाम
कई प्रमुख मार्गों पर स्मार्ट सिटी और यातायात प्रबंधन के तहत गोल चौराहों को बंद कर डायवर्जन लागू किए गए हैं। कुछ स्थानों पर चौराहा अपेक्षाकृत खाली दिखाई देता है, जबकि उससे महज 10 से 15 मीटर आगे वाहनों का दबाव बढ़ने से जाम की स्थिति बन जाती है। इससे वाहन चालकों को अनावश्यक रूप से लंबा रास्ता तय करना पड़ता है और पीक आवर्स में समस्या और बढ़ जाती है।
यातायात पुलिस की कम मौजूदगी भी चुनौती
यातायात व्यवस्था को संभालने के लिए कई स्थानों पर पर्याप्त संख्या में यातायात पुलिसकर्मी नजर नहीं आते। कुछ जगहों पर ट्रैफिक नियंत्रण की जिम्मेदारी स्थानीय थानों और चौकियों के पुलिसकर्मियों के भरोसे दिखाई देती है। इससे यह सवाल उठता है कि यातायात व्यवस्था की नियमित निगरानी कौन कर रहा है और जाम की स्थिति में त्वरित हस्तक्षेप की जिम्मेदारी किस स्तर पर तय है।
ई-रिक्शा की बढ़ती संख्या से भी बढ़ रहा दबाव
शहरों में बड़ी संख्या में ई-रिक्शा के संचालन से भी प्रमुख मार्गों और चौराहों पर यातायात का दबाव बढ़ा है। ई-रिक्शा रोजगार का साधन हैं, लेकिन उनके लिए रूट निर्धारण, पार्किंग, संचालन और यातायात नियंत्रण की स्पष्ट व्यवस्था भी जरूरी है। बिना नियोजित संचालन के व्यस्त मार्गों पर वाहनों की गति प्रभावित होने की स्थिति बनती है।
सीसीटीवी कैमरों के साथ जमीनी निगरानी जरूरी
शहरों में यातायात निगरानी और ई-चालान के लिए बड़ी संख्या में सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं। कैमरों के जरिए नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई भी की जाती है, लेकिन केवल तकनीकी निगरानी से यातायात व्यवस्था पूरी तरह सुचारु नहीं हो सकती। जाम की स्थिति में मौके पर यातायात कर्मियों की मौजूदगी और तत्काल हस्तक्षेप भी जरूरी है।
यातायात नीति और जवाबदेही पर जोर
बढ़ते वाहनों के दबाव के बीच प्रदेश के शहरों में यातायात व्यवस्था को लेकर दीर्घकालिक योजना की जरूरत महसूस की जा रही है। ई-रिक्शा संचालन, पार्किंग, यू-टर्न, डायवर्जन, चौराहों की डिजाइन और यातायात पुलिस की तैनाती जैसे मुद्दों पर स्पष्ट नीति बनाए जाने की आवश्यकता है।
आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर यातायात व्यवस्था भी राजनीतिक दलों के घोषणा पत्रों में प्रमुख मुद्दा बन सकती है। हालांकि, यातायात सुधार के लिए केवल घोषणाओं के बजाय जिम्मेदार अधिकारियों की स्पष्ट भूमिका, नियमित निगरानी और व्यवस्था में खामियां मिलने पर जवाबदेही तय करना भी महत्वपूर्ण होगा।
प्रदेश में बढ़ते शहरीकरण और वाहनों की संख्या के बीच यातायात प्रबंधन अब केवल चौराहों पर पुलिसकर्मियों की तैनाती तक सीमित नहीं रह सकता। तकनीक, बेहतर सड़क डिजाइन, वैज्ञानिक ट्रैफिक प्लानिंग और प्रभावी जमीनी निगरानी के समन्वय से ही जाम की समस्या से निपटने की दिशा में स्थायी सुधार संभव है।
लेखक के बारे में
Syed Fiza Khatoon
सैयद फ़िज़ा खातून ‘विजुअल लाइव’ की तकनीकी एवं डिजिटल टीम की महत्वपूर्ण सदस्य हैं। वर्ष 2014 में स्नातक की शिक्षा पूरी करने के बाद से उन्होंने मीडिया के तकनीकी और डिजिटल कार्यों में अपनी दक्षता विकसित की है। न्यूज के लेआउट और प्रस्तुतीकरण, कंटेंट के डिजिटल प्रसारण तथा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर खबरों के अपडेट में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। खबर को बेहतर तरीके से प्रस्तुत करने से लेकर उसके डिजिटल वितरण तक वह जिम्मेदारियों का कुशलतापूर्वक निर्वहन करती हैं। सौम्य और मिलनसार स्वभाव के साथ नई तकनीकों और बदलते डिजिटल मीडिया को सीखने की निरंतर ललक उनकी कार्यशैली की खास पहचान है। टीम के साथ बेहतर समन्वय बनाकर काम करना और हर कार्य में कुछ नया सीखना उनकी पेशेवर सोच को दर्शाता है। डिजिटल पत्रकारिता के तेजी से बदलते दौर में तकनीकी समझ और रचनात्मक सोच के साथ सटीक, आकर्षक और प्रभावी न्यूज प्रस्तुतीकरण* में उनका योगदान ‘विजुअल लाइव’ की डिजिटल टीम को मजबूती प्रदान करता है। Syed Fiza Khatoon की सभी खबरें देखें →
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