नाटक 'क्रियाकर्म ट्वेंटी फोर सेवन एक द रेट जीमेल डाट काम' का मंचन

व्यंग्य से करुणा तक संवेदनहीन होते समय का आईना
लखनऊ, 8 सितंबर।बदलते पारिवारिक मूल्यों और बुजुर्ग माता-पिता के प्रति घटती संवेदनशीलता की ऐसी ही एक बेचैन करने वाली तस्वीर सामने रखता है नाटक 'क्रियाकर्म ट्वेंटी फोर सेवन एक द रेट जीमेल डाट काम'। राम किशोर नाग के लिखे नाटक को आज शाम बिम्ब सांस्कृतिक मंच के कलाकारों ने संस्कृति मंत्रालय दिल्ली और संस्कृति निदेशालय उत्तर प्रदेश के सहयोग से राय उमानाथ बली प्रेक्षागृह कैसरबाग में महर्षि कपूर के निर्देशन में प्रस्तुत किया।

साहित्य केवल समाज का प्रतिबिंब नहीं होता, वह उसके भीतर छिपी उन दरारों को भी दिखाता है, जिन्हें हम अक्सर देखना नहीं चाहते। मंचित नाटक की कहानी का केंद्र एक वृद्ध दंपती और उनके तीन बेटे हैं। तीनों अपनी-अपनी नौकरी, परिवार और सुविधाओं में इस कदर उलझे हैं कि माता-पिता के अंतिम संस्कार जैसा पारंपरिक पारिवारिक दायित्व भी उन्हें एक ‘समस्या’ दिखाई देने लगता है। समाधान के लिए वे एक ऐसी कंपनी का सहारा लेते हैं, जो अंतिम संस्कार के अलग-अलग पैकेज उपलब्ध कराती है। तीनों भाई भावनाओं के बजाय सुविधा और खर्च के हिसाब से सबसे सस्ता विकल्प चुनते हैं।
यहीं कहानी का व्यंग्य अपनी धार पाता है। जिस क्रिया-कर्म में कभी श्रद्धा, संस्कार और पुत्रधर्म की भावना जुड़ी होती थी, वह अब बाजार की भाषा में ‘पैकेज’ बन जाता है। लेखक इस विडंबना पर कोई उपदेश नहीं देता, बल्कि परिस्थितियों के माध्यम से पाठक को स्वयं निष्कर्ष तक पहुँचाता है।
कहानी का सबसे मार्मिक प्रसंग अंत में आता है। शेखर का बेटा डब्बू पूरी बातचीत सुनने के बाद कंपनी के मैनेजर को अपने माता-पिता के क्रिया-कर्म के लिए सौ रुपये अग्रिम देता है। पिता की डाँट पर डब्बू का मासूम जवाब पूरी कहानी का आईना बन जाता है कि जब उसके माता-पिता अपने माता-पिता के लिए समय और संवेदना नहीं निकाल पा रहे, तो अगली पीढ़ी भी उसी व्यवहार को क्यों न अपनाए?
यही कहानी का मूल प्रश्न है। हम अपने बच्चों के लिए जो मूल्य छोड़ रहे हैं, क्या वही कल हमारे हिस्से में लौटकर नहीं आएँगे?
कहानी का अंत पाठक को चुप कर देता है। व्यंग्य से शुरू होकर करुणा तक पहुँचती यह कथा रिश्तों के उस ‘क्रिया-कर्म’ की ओर संकेत करती है, जो शायद अंतिम संस्कार से बहुत पहले शुरू हो चुका है।
प्रस्तुति की प्रमुख भूमिकाओं में गुरुदत्त पाण्डेय, अम्बुज अग्रवाल, कुलदीप श्रीवास्तव, केके पाण्डेय, विशाल सिंह, दक्ष कपूर और शिखा श्रीवास्तव मंच पर उतरे। प्रकाश व संगीत संचालन जैसे पक्षों में तमाल बोस व अनामिका सिंह के साथ सरिता कपूर, सारिका श्रीवास्तव, आस्था श्रीवास्तव, विशाल सिंह, पूनम बोस, राकेश कोहली, रीता नाग, राजीव प्रकाश और अन्य कलाकारों का सहयोग रहा। अतिथियों के तौर पर राज्य ललित कला अकादमी के उपाध्यक्ष गिरीश चंद्र मिश्र, कला समीक्षक राजवीर रतन, रंगकर्मी प्रेम शंकर भारती, राकेश कोहली, पत्रकार नवल किशोर त्रिपाठी एवं श्रीमती कीर्ति नारायण विशेष रूप से उपस्थित रहे।
लेखक के बारे में
Santosh Kumar Singh
श्री सिंह ‘विजुअल लाइव’ मासिक पत्रिका एवं न्यूज पोर्टल के संपादक के रूप में पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। वर्ष 2004 से उन्होंने प्रिंट और डिजिटल मीडिया में अपनी सेवाएं देते हुए पत्रकारिता का लंबा अनुभव अर्जित किया है। लखनऊ से प्रकाशित हिन्दी दैनिक राष्ट्रीय सहारा, डेली न्यूज एक्टिविस्ट, राष्ट्रीय स्वरूप और भारत प्रतिदिन सहित विभिन्न मीडिया संस्थानों के लिए उन्होंने रिपोर्टिंग की है। प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के लखनऊ आगमन से लेकर राजनीति, प्रशासन, जनसरोकार और शहर की महत्वपूर्ण घटनाओं की रिपोर्टिंग में उनकी सक्रिय भूमिका रही है। श्री सिंह की विशेष रुचि खोजी पत्रकारिता और डिजिटल माध्यमों के प्रभावी इस्तेमाल में है। इंटरनेट आधारित शोध, सूचना के स्रोतों की पड़ताल और खबर की बारीकियों तक पहुंचने की उनकी कार्यशैली उन्हें अलग पहचान देती है। बदलते मीडिया परिदृश्य में वे तथ्यपरक, विश्वसनीय और जनसरोकार से जुड़ी पत्रकारिता को प्राथमिकता देते हैं। पत्रकारिता के साथ उन्हें संगीत और यात्रा में विशेष रुचि है। उनका मानना है कि एक पत्रकार के लिए जिज्ञासा, निरंतर सीखने की प्रवृत्ति और तथ्यों के प्रति ईमानदारी सबसे महत्वपूर्ण गुण हैं। Santosh Kumar Singh की सभी खबरें देखें →
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